Composing…
Composing…
Seeking blessings of Goddess Durga for protection, removal of sins, and fulfillment of desires.
दुर्गा चालीसा
When to recite: Navratri, daily, especially during difficulties
Durga Chalisa is a devotional hymn to Maa Durga, the Divine Mother who protects devotees and destroys forces of adharma. It is commonly recited during Navratri, Friday worship, Durga Puja, and periods of difficulty.
The verses praise Durga as Ambika, Bhavani, Annapurna, Lakshmi, Saraswati, Kali, and the power behind the devas. The chalisa helps devotees approach the Goddess as both fierce protector and compassionate mother.
The chalisa remembers Durga's many forms, her role in nourishing and protecting the worlds, and her victories over demons such as Shumbha, Nishumbha, Raktabija, and Mahishasura. The devotee asks for refuge, strength, and removal of distress.
Devanagari / Hindi script
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥ तुम संसार शक्ति लय कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुमही आदि सुन्दरी बाला॥ प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥ रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। प्रगट भई फाड़कर खम्बा॥ रक्षा कर प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥ क्षीरसिंधु में करत विलासा। दयासिंधु दीजे मन आसा॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥ मातंगी अरु धूमावती माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥ केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥ कर में खप्पर खड्ग विराजे। जाको देख काल डर भाजे॥ सोहे अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँ लोक में डंका बाजत॥ शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥ रूप कराल काली को धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ परी गाढ़ संतन पर जब-जब। भई सहाय मातु तुम तब-तब॥ अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहे अशोका॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥ प्रेम भक्ति से जो यश गावे। दुःख-दारिद्र निकट नहिं आवे॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥ जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥ शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥ निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥ शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछतायो॥ शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय अम्बे भवानी॥ भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥ मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरे दुख मेरो॥ आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब दुख दावें॥ शत्रु नाश कीजे महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥ करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दे करहु निहाला॥ जब लगि जियउँ दया फल पाऊँ। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥ दुर्गा चालीसा जो नित गावे। सब सुख भोग परमपद पावे॥ देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥